April 15, 2024

धरती के भगवान को सलाम: #DOCTOR’S DAY, कहानी ऐसे डॉक्टर दंपत्ति की जो सेवा परमो धर्मः के सूत्र वाक्य पर निरंतर दे रहे हैं अपनी सेवा, मरीजों की सेवा को ये मानते हैं सबसे बड़ा धन, नई पीढ़ी के लिए बने प्रेरणास्रोत…. देखें वीडियों

बालोद- भगवान के बाद धरती पर अगर किसी को भगवान का दर्जा दिया जाता है तो वह हैं डॉक्टर। कोरोना काल में जहां हर आम से लेकर खास इंसान घरों में कैद थे। कोरोना से बचाव का प्रयास कर रहा थे। वही डॉक्टर खुद कोरोना के खतरे को झेलते हुए भी दूसरों की जिंदगी को बचाने की जद्दोजहद में जुटे हुए थे। संक्रमण काल में डॉक्टर्स जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे लोगों का न केवल इलाज कर रहे थे। बल्कि उन लोगों को नया जीवन भी दे रहे थे। आज डॉक्टर्स डे पर “पायनियर” भी ऐसे डॉक्टरों को सलाम कर रहा है। जिन्होंने अपना जीवन जोखिम में डालकर लोगों की सेवा की। जिले में भी एक ऐसे डॉक्टर दंपत्ति है, जो विगत कई वर्षों से दिन रात एक कर अपनी सेवाएं निरंतर दे रहे है। हम बात कर रहे है, डॉक्टर संजीव ग्लैड और डॉक्टर रश्मि ग्लैड की। जो रिश्ते में पति-पत्नी है। डॉ. संजीव ग्लैड वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी है। साथ ही वे टीवी, एनसीडी, हेल्थ एन्ड वेल्थ सेंटर, महामारी नियंत्रण, कोविड नोडल सहित विभिन्न पदों की जिम्मेदारी भी संभाल रहे है। वही रश्मि ग्लैड अर्जुन्दा पीएससी में वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी पर पदस्थ हैं। डॉ. संजीव और उनकी पत्नी डॉ. रश्मि भी उन वॉरियर्स में से एक है। जिन्होंने महामारी काल में अपने जीवन को खतरे में डालकर दूसरों की सेवा की। “पायनियर” से बातचीत में डॉक्टर ग्लैड दंपत्ति ने कोरोनाकाल से जुड़ी घटना, अपने जीवन के अनुभव और इस पेशे को चुनने को साझा किया।

कोरोनाकाल का दौर बहुत चैलेंजेस था- डॉ. रश्मि ग्लैड
डॉ. रश्मि बताती है कि वे 19 वर्षों से इस पेशे में हैं। उन्हें प्रेरणा उनके मामा-मामी से मिली, जो कि सरकारी डॉक्टर थे। बचपन से हम देखते थे कि किस इमोशन से वे पेसेंट की सेवा करते हैं और मरीज भी उन्हें खुशी से सम्मान देते थे। रश्मि आगे बताती है कि शुरू से ही इच्छा थी ग्रामीण इलाकों में अपनी सेवा दे, चूंकि बहुत से ऐसे गरीब मरीज होते है, जिनका कोई सहारा नही होता। ग्राम घोटिया में पहली पोस्टिंग के दौरान काफी कठिनाईयों का भी सामना करना पड़ा। क्योंकि काफी इंटीरियर था। मन में एक विश्वास था कि मैं यहां कार्य कर लुंगी। दो कमरे का घर लेकर मैंने 8 साल वहां अपनी सेवा दी है। उस समय न ही मोबाइल की सुविधा थी और न ही टीवी हुआ करता था। रश्मि आगे बताती है कि ड्यूटी के दौरान परिवार से दूर रहना पड़ता है, ड्यूटी से ऑफ होने के बाद समय निकाल लेते है। लेकिन कोरोनाकाल में यह सम्भव नही हो पाता था। कोरोनाकाल का दौर बहुत चैलेंजेस था। देशभर के लोगों से उसे देखा है। हम जब उस समय फील्ड पर जाते थे फिर उसके बाद घर लौटना होता था, तो एक डर से लगा रहता था। लेकिन सेवा को ही धर्म मानकर कोविड के दौरान पूरी गाईडलाईन का पालन कर सेवाएं दी हैं। और इस बात की बेहद खुशी है।

एक बार हुआ था कोविड पॉजिटिव- डॉ. संजीव ग्लैड
वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी डॉ. संजीव ग्लैड बताते है कि उन्हें डॉक्टर बनने की प्रेरणा उनके माता पिता से मिली, जो कि भिलाई इस्पात सयंत्र हॉस्पिटल में नर्सिंग सुप्रीटेंडेंट थे। इस पेशे मे लगभग मुझे 20 साल हो गए हैं। माता-पिता की मरीजो के लिए सेवा को देखते हुए मैंने इस डॉक्टरी के पेशे को चुना हैं। डॉ. संजीव ने आगे बताया कि कोविड का समय काफी कठिन था। सभी सेंटरों का विजिट करना, फिर घर लौटना। बहुत चुनौतियां थी। लेकिन खुशी इस बात की है उस दौर में सभी के साथ मिलकर हमने बहुत अच्छा काम किया। डॉ. संजीव बताते है कि उस दौरान एक बार वे पॉजिटिव भी आए थे। तब खुद को होम आइसोलेट कर लिया था। सुरक्षा के मद्देनजर मेरी पत्नी ने भी खुद को होम आइसोलेट किया था। लेकिन जब मैंने जैसे ही ठीक हुआ, तो मैने तत्काल ड्यूटी ज्वाइन की।

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