July 13, 2024

न्याय के साथ यह कैसा अन्याय…?

देश के किसी राजनीतिक दल पर सबसे बड़ा हमला, कांग्रेस के तत्कालीन पीसीसी चीफ समेत कई दिग्गज हुए थे शहीद

 भारतीय क्या अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था में भी न्याय तुरंत नहीं मिलता। और जब मिल जाए तो पीडि़त परिवारों के लिहाज से देखे जाने के बजाय सियासी चश्मे से देखा जाता है। भारत में हमेशा यही होता रहा है। सत्ता पर बैठे लोग अपनी सुविधा व सोच के हिसाब से न्याय की उम्मीद करते हैं न मिलने की अवस्था में उस पर खेल जाते हैं। झीरम घाटी नरसंहार मामले में गठित

न्यायिक आयोग की रिपोर्ट के साथ यही कर दिया गया। बरसों से पीडि़त परिवारों के समक्ष न्याय पाने का अवसर आया था, उसे सियासी लिहाज से एक झटके में कम से कम छह आगे धकेल दिया गया। झीरम घाटी हत्याकांड के महज तीसरे दिन 28 मई 2013 को तत्कालीन सरकार ने न्यायाधीश प्रशांत मिश्रा की एकल न्यायिक जांच आयोग का गठन किया था। आयोग का कार्यकाल 20 बार बढ़ाया गया। आखिरी बार जून 2021 को बढ़ाया गया और 30 सितंबर 2021 को अंतिम मियाद माना गया। इस अवधि तक भी रिपोर्ट न आ सकी, लेकिन करीब एक माह बाद बीते 6 नवंबर 2021 को जस्टिस प्रशांत मिश्रा के सचिव की ओर से रिपोर्ट राज्यपाल को सौंप दी गई। फिर तो पीडि़त पक्ष का ध्यान व नैसर्गिक न्याय को दृष्टिगत रखकर रिपोर्ट राज्य विधानसभा की पटल पर प्रस्तुत कर दिया जाना था, लेकिन ऐेसा नहीं किया गया। पीडि़तों ने न्याय के लिए साढ़े आठ साल गुजार दिए। यह अवधि और बढ़ा दी गई। रिपोर्ट विधानसभा में सार्वजनिक करने से कम से कम यह तो पता चल ही जाता कि किसके इशारे पर षडयंत्र के तहत उनके परिजन हमले में मारे गए। राजनीतिक हाथ होने की संभावना उस दौर में जाहिर की गई थी। इसका भी खुलासा हो सकता था। तब कुछ कांग्रेस नेताओं को आशंका थी कि भाजपा का हाथ हो सकता है। इस पर से भी पर्दा उठ सकता था। इसे सरकार ने सिर्फ प्रेस्टिज इश्यु बना कर खत्म कर दिया। क्या यह पीडि़त पक्ष के साथ अन्याय नहीं है? इसके बाद जो फसाद शुरू हुआ उसकी आंच में पीडि़त परिवार जल रहे हैं उसे देखने वाला कोई नहीं है। सवाल उठाया जा रहा कि रिपोर्ट पारंपरिक रूप से राज्य सरकार को सौंपने के बजाय राज्यपाल को क्यों सौंपा गया? सवाल अपनी जगह वाजिब हो सकता है, लेकिन इस पर बवाल किया जाना क्या उचित है? मुख्यमंत्री भूपेश बघेल इस मामले को गंभीरता से लेने के बजाय एक फिल्मी नायक की तरह सीधे फ्रंटफुट पर आ गए। वह भी रिपोर्ट के 10 खंडों और 4 हजार 184 पेज में क्या है क्या नहीं जाने बगैर, फिर तो दाल की रंगत का अनुमान लगाया जा सकता है। रिपोर्ट में क्या है इसे जाने बगैर कांग्रेस के भीतर बवाल मच गया आखिर क्यों? कांग्रेस इसे मान्य परंपरा का उल्लंंघन बता रही है। हो सकता है मान्य परंपरा का उल्लंघन हुआ है तो क्या इसी वजह से आयोग की रिपोर्ट परोक्ष रूप से खारिज कर दी जाए? खारिज जैसे शब्द से बचने उसी आयोग में दो नए सदस्य नियुुक्त कर कार्यकाल आगे बढ़ा दिया जाए? फिर तो यह भी सवाल उठता है कि क्या राज्यपाल राज्य सरकार नहीं है? यदि ऐसा है तो हर सत्र के अभिभाषण में -मेरी सरकार- से उद्बोधन क्योंं? संभवत: मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पास इसका कोई जवाब नहीं होगा। रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपे जाने से सवाल उठ रहा है कि राज्य सरकार दागी अथवा कसूरवार को बचा सकती है? संभवत: इसी बात को मद्देनजर रख कर रिपोर्ट मुख्यमंत्री के बजाय राज्यपाल को सौंपी गई। सवाल यह भी है कि रिपोर्ट आखिर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को क्यों नहीं सौंपी गई? क्या आयोग की रिपोर्ट में किसी नेता की भूमिका है? जिसे बचाए जाने की आशंका थी? इसीलिए रिपोर्ट सीधे राज्यपाल को सौंप दी गई? बहरहाल यह सुलगता सवाल है जिसका सतह पर आना पीडि़त परिवारों व राज्य जनता के लिहाज से जरूरी है। आयोग की रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपे जाने के बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने प्रतिक्रिया में कहा, आयोग का कार्यकाल पूरा हो चुका था। सवाल यह है कि जब 20 बार कार्यकाल बढ़ाया गया तो पीडि़तों के न्याय की खातिर 21 वीं बार नहीं बढ़ाया जा सकता था? सीएम बघेल ने तब यह कहा कि रिपोर्ट अभी अधूरी है। सवाल उठता है रिपोर्ट राज्यपाल को सौंप दिए जाने के बाद भी अधुरी कैसे है? उन्होंने यह भी कहा कि इस पर विचार कर निर्णय लिया जाएगा और ले भी लिया गया। झीरम घाटी हमले की जांच के लिए राज्य सरकार ने बिलासपुर उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति सतीश के. अग्निहोत्री को आयोग का अध्यक्ष एवं न्यायमूर्ति जी. मिन्हाजुद्दीन को आयोग का सदस्य नियुक्त किया है। सामान्य प्रशासन विभाग ने 11 नवंबर को इसकी अधिसूचना भी जारी कर दी। यह सब सीएम बघेल के बयान के 24 घंटे के भीतर कर दिया गया। इसके पहले कांग्रेस सीडिया सेल प्रमुख सुशील आंनद शुक्ला व पीसीसी चीफ मोहन मरकाम की ओर से बयान आया कि झीरम घाटी की जांच के लिए नए आयोग का गठन किया जाए। संभवत: इसका ब्लू प्रिंट पहले से तैयार था। इसीलिए आनन-फानन में सब कुछ कर दिया गया। सामान्य प्रशासन विभाग की अधिसूचना में कहा गया है, जस्टिस प्रशांत मिश्रा आयोग का कार्यकाल 30 सितंबर 2021 को समाप्त हो चुका है। इस बीच न्यायमूर्ति प्रशांत मिश्रा का स्थानांतरण आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय में हो गया है। ऐसे में सरकार ने आयोग में दो नए सदस्यों को शामिल करने का निर्णय लिया है। इन पंक्तियों से लगता है सब कुछ सामान्य है और जांच आयोग की ओर से रिपोर्ट राज्यपाल को नहीं सौंपी गई है। एक तरह से यह सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से राजभवन को बायपास करना है। सवाल यह है कि यह कार्य सितंबर 2021 अथवा जस्टिस प्रशांत मिश्रा के रिलीव होने के तुरंत बाद क्यों नहीं किया गया? अधिसूचना में यह भी उल्लेख है कि दो सदस्यीय आयोग पूर्व में जारी जांच के बिंदुओं के अतिरिक्त तीन नए बिंदुओं की जांच करेगा। पहला, क्या हमले के बाद पीडि़तों को समुचित चिकित्सा उपलब्ध कराई गई? दूसरा, ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए क्या समुचित कदम उठाए गए थे? तीसरे में अन्य महत्वपूर्ण बिंदु जो परिस्थितियों के मुताबिक आयोग निर्धारित करे। इन बिंदुओं से लगता है जांच में पिछली सरकार की घेरेबंदी का प्रयास है। जिससे अब कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता। ज्यादा से ज्यादा राजनीतिक होहल्ला ही किया जा सकता है। इससे पीडि़त परिवारों को क्या न्याय मिल जाएगा? जांच आयोग के दोनों सदस्यों को छह महीने में जांच पूरी कर रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपने निर्देश हैं। झीरम के इस हत्याकांड में कम से कम राजनीति के लिए कोई स्थान नहीं होना था, लेकिन यही हो रहा है। झीरम घाटी मामले में बकौल कांग्रेस अधिवक्ता सुदीप श्रीवास्तव शासन को अधिकृत तौर पर यह जानकारी नहीं है कि आयोग ने अपनी रिपोर्ट राज्यपाल को सौंप दी है। बात हजम योग्य नहीं है। राजभवन व मुख्यमंत्री निवास में कोई खास दूरी नहीं है। फिर संचार माध्यम इतना तेज है कि पलक झपकते सभी तरह की सूचना संबंधित को मिल जाती है। खैर, रिपोर्ट सौंपी जा चुकी है। यही सच है। बाकी राजनीति व वकालती मुद्दे हैं। बकौल कांग्रेस अधिवक्ता श्रीवास्तव के अनुसार जस्टिस प्रशांत मिश्रा जांच आयोग की ओर से जो अंतिम पत्र भेजा गया था, उसमें जांच अधूरी होने का उल्लेख है और अतिरिक्त समय देने की मांग की गई थी। जस्टिस मिश्रा आंध्रप्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बनाए गए हैं। अब सवाल यह उठता है कि यह कार्य उसी समय कर लिया जाना था, लेकिन मौन क्यों साधे रहे? सच यह भी है कि कांग्रेस वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव के मैदान में उतरी तो अपने -जन घोषणा पत्र- को झीरम घाटी के शहीदों को समर्पित करते हुए यह भाव जताया था कि परिजनों को शीघ्र न्याय दिलाएंगे। शपथ ग्रहण के बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कर्जमाफी की फाइल में दस्तखत करते हुए झीरम घाटी कांड की जांच कराने एसआईटी गठन को हरी झंड़ी दी थी। आज करीब तीन साल बीतने को है कहां है एसआईटी जनता तो दूर सरकार के मंत्रिमंडल के सदस्य भी नहीं जान पा रहे हैं। इस पर भी कोई बहस नहीं हो सकती कि सरकार न्यायिक आयोग की जांच स्वीकार करे या न करे। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने यह स्पष्ट कर दिया है कि न्यायिक जांच आयोग न्यायालय नहीं है। आयोग कोई फैसला नहीं देता, बल्कि सिफारिश करता है। इसे मानने या न मानने सरकार स्वतंत्र है। फिर भी सरकार व कांग्रेस पार्टी स्तर पर बवाल किया गया। बहरहाल इसके लिए कम से कम छह माह और इंतजार करना होगा। कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर 25 मई 2013 को झीरम घाटी में हुए एक नक्सली हमले में 29 लोग मारे गए थे। इसमें कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके पुत्र दिनेश पटेल, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा, राजनांदगांव के उदयीमान नेता उदय मुदलियार जैसे कई दिग्गजों के नाम शामिल थे। यह देश में किसी राजनीतिक दल पर हुआ सबसे बड़ा हमला था। इस घटना दर्द बहुत दूर तक गया था। इसके लिए सियासत करने के बजाय पीडि़त परिवारों के साथ खड़ा होने की जरूरत थी, लेकिन कांग्रेस यह भी न कर सकी। इससे यही लगता है झीरम के न्याय के साथ अन्याय किया जा रहा है।

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